मध्य प्रदेश के छतरपुर जिले में स्थित बागेश्वर धाम के पीठाधीश्वर पंडित धीरेंद्र कृष्ण शास्त्री एक बार फिर सुर्खियों में हैं। पश्चिम बंगाल में दुर्गा पूजा के दौरान दिए गए उनके एक बयान को लेकर सियासी और सामाजिक हलकों में जमकर बवाल मचा। इस विवाद के बाद ब्रिटेन में मौजूद पंडित धीरेंद्र शास्त्री ने अपने बयान पर सफाई पेश की है।
क्या था पूरा मामला
पश्चिम बंगाल में दुर्गा पूजा के मौके पर आयोजित एक कार्यक्रम में दिए गए बयान को लेकर पंडित धीरेंद्र कृष्ण शास्त्री विवादों में घिर गए। उनके बयान का अलग-अलग तरीकों से मतलब निकाला गया, जिसके बाद सोशल मीडिया पर इसे लेकर तीखी प्रतिक्रियाएं सामने आने लगीं। कुछ ही घंटों में यह मामला राष्ट्रीय स्तर पर चर्चा का विषय बन गया और अलग-अलग राजनीतिक दलों की तरफ से भी इस पर टिप्पणियां आईं।
धीरेंद्र शास्त्री ने दी सफाई
विवाद बढ़ता देख पंडित धीरेंद्र कृष्ण शास्त्री ने अपने एक प्रवचन कार्यक्रम के दौरान इस पर सफाई पेश की। उन्होंने कहा कि उनके बयान का गलत अर्थ निकाला गया है। उनका कहना था कि वह किसी के खान-पान या जीने की आजादी पर कोई रोक-टोक नहीं लगा रहे थे, बल्कि एक धार्मिक गुरु होने के नाते वह सिर्फ अहिंसा का संदेश देने की कोशिश कर रहे थे। उन्होंने स्पष्ट किया कि उनका मकसद किसी को आहत करना या किसी समुदाय को निशाना बनाना नहीं था।
सोशल मीडिया पर छिड़ी बहस
इस पूरे मामले ने सोशल मीडिया पर एक बड़ी बहस को जन्म दे दिया है। एक तबका पंडित धीरेंद्र शास्त्री के समर्थन में उतर आया और उनके बयान को धार्मिक स्वतंत्रता और परंपरा से जोड़कर देखा। वहीं दूसरे तबके ने इस बयान को व्यक्तिगत पसंद और स्वतंत्रता में दखल बताते हुए आलोचना की। हैशटैग्स के जरिए दोनों पक्षों के समर्थक अपनी-अपनी राय सोशल मीडिया पर लगातार साझा कर रहे हैं।
बागेश्वर धाम की बढ़ती लोकप्रियता
गौरतलब है कि पिछले कुछ वर्षों में पंडित धीरेंद्र कृष्ण शास्त्री और बागेश्वर धाम की लोकप्रियता देशभर में तेजी से बढ़ी है। उनकी कथाओं और दरबार कार्यक्रमों में लाखों की संख्या में श्रद्धालु शामिल होते हैं, और सोशल मीडिया पर भी उनकी बड़ी फॉलोइंग है। यही वजह है कि उनका कोई भी बयान बहुत जल्दी राष्ट्रीय सुर्खियां बन जाता है, चाहे वह धार्मिक विषय पर हो या सामाजिक मुद्दों पर।
राजनीतिक दलों की प्रतिक्रिया
इस विवाद के दौरान अलग-अलग राजनीतिक दलों की प्रतिक्रियाएं भी सामने आईं, जिसमें कुछ दलों ने इस बयान का समर्थन किया तो कुछ ने इसकी आलोचना करते हुए इसे बांटने वाली राजनीति से जोड़ा। इस तरह के बयान अक्सर धार्मिक और राजनीतिक बहस के बीच की रेखा को धुंधला कर देते हैं, जिससे मामला और तूल पकड़ लेता है।



